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भारत की संसद:-

भारत की संसद का नाम संसद है| भारत की संसद अथवा पार्लियामेंट विधान पालिका का सर्वोच्च निकाय है भारतीय संसद में राष्ट्रपति तथा दो लोकसभा और राज्यसभा होते हैं |

 
भारत की संसद का क्या नाम है?Indian parliament

संसद का गठन (Constitution of Parliament):-

संसद जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। जिसके माध्यम से आम जनता की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। संविधान का अनुच्छेद-79 संसद के तीन अंग निर्धारित करता है- राष्ट्रपति (President), लोकसभा (House of The People) तथा राज्य सभा (Council of States)|                                                                                                                                                          यद्यपि राष्ट्रपति, संसद के किसी सदन का सदस्य नहीं होता है और न ही संसद में बैठता है फिर भी, वह संसद का अभिन्न अंग है, क्योंकि संसद के सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर (स्वीकृति) के बाद ही विधि (कानून) का रूप ग्रहण करता है। इसके अतिरिक्त, संसदीय प्रक्रिया में राष्ट्रपति के कुछ अन्य महत्वपूर्ण कार्य भी हैं, जो निम्नवत् हैं:- 
  1.  नव निर्वाचित लोकसभा के प्रथम सत्र के प्रारम्भ पर तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के प्रारम्भ पर राष्ट्रपति संयुक्त रूप से दोनों सदनों को सम्बोधित (Address) करता है।
  2.  राष्ट्रपति, दोनों सदनों के सत्र आहूत (Summon) करता है एवं सत्रावसान (Prorogation) करता है।
  3.  राष्ट्रपति लोक सभा को विघटित (Dissolve) कर सकता है।
  4. जब संसद का सत्र न चल रहा हो तो आवश्यकता पड़ने पर वह अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकता है।
                           भारतीय संसदीय व्यवस्था में विधायिका एवं कार्यपालिका में परस्पर निर्भरता की स्थिति है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि, भारत के राष्ट्रपति की स्थिति ब्रिटेन की संसद में ताज (Crown) अर्थात् वहाँ के राजा/रानी के समान है जबकि, अमेरिकी राष्ट्रपति से पूर्णत: भिन्न है।

संसद का सदस्य बनने हेतु Qualifications:-

संविधान का अनुच्छेद-84 संसद का सदस्य बनने के लिए कुछ Qualifications निर्धारित करता है, जो निम्नलिखित हैं:-
  1. व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  2. राज्य सभा के लिए कम से कम 30 वर्ष तथा लोक सभा के लिए 25 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
  3. इस सन्दर्भ में संसद द्वारा बनायी गयी अन्य अर्हताओं को पूर्ण करता हो। 
                                                                                                       संविधान का अनुच्छेद-84 संसद को यह शक्ति देता है कि, वह संसद की सदस्यता धारण करने के लिए संविधान में दी गयी अर्हताओं के अतिरिक्त कुछ अन्य अर्हताएँ भी निर्धारित कर सकती है। अनुच्छेद-84 में संसद की सदस्यता के लिए अर्हताओं का जबकि अनुच्छेद-102 में संसद की सदस्यता के लिए निरर्हताओं का उल्लेख किया गया है।

👉संसद भारत का सर्वोच्च विधाई  निकाय यानी कानून बनाने वाली सर्वोच्च संस्था है , यानी संसद में दो  साधनों की व्यवस्था है | भारतीय संसद में राष्ट्रपति ,दो सदन एक राज्यसभा (राज्य की परिसद )दूसरा लोकसभा( लोगों का सदन ) की व्यवस्था है | राष्ट्रपति के पास संसद के दोनों सदनों में से किसी भी सदन को बुलाने ,स्थगित  और लोकसभा को भंग करने की शक्ति  है |

 

👉भारतीय संसद का संचालन संसद भवन मे होता है जो दिल्ली मे है |संसद भवन शिलान्यास ड्यू ऑफ कनोट ने किया था ,जिसकी तिथि है 12 फरवरी 1921 | संसद भवन को बनने  में 6 वर्ष का समय लगा था |18 फरवरी 1927 को इसका उद्घाटन तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड जनरल इरविन ने किया था |

 

👉संविधान निर्माताओं ने देश के शासन के संसदीय लोकतंत्र प्रणाली का चयन किया ,इसके प्रमुख तीन अंग होते हैं:-कार्यपालिका ,विधायिका और न्यायपालिका|

 

इन तीनों को पृथक रखा गया है यानी अलग-अलग रखा गया है क्योंकि संविधान निर्माताओं का विचार है कि कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालि को एक ही निकाय में निहित नहीं होने चाहिए |

 

👉कार्यपालिका ,विधायिका और न्यायपालिका को अलग अलग रखना शक्ति पृथक्करण सिद्धांत का उदाहरण है शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत 18 वीं सदी में एक फ्रांसीसी दार्शनिक मांटिस क्यू द्वारा प्रतिपादित किया गया था|

उनका यह मत था की यदि सरकार की शक्तिया एक ही निकाय में निहित होगी  तो वह निरंकुश हो जाएगीऔर शक्ति मनुष्य को भ्रष्ट कर देती है इसलिए उन्होंने कहा कि सरकार के तीनों अंग एक दूसरे से पृथक हो और कोई भी व्यक्ति एक से अधिक अंग  का सदस्य ना हो|

 

यद्यपि शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को भारतीय संविधान में कठोरता से लागू नहीं किया गया है लेकिन इस बात का पर्याप्त ध्यान रखा गया है कोई भी अंग निरंकुश ना हो जाए इसके  लिए संविधान इसकी रोकथाम की व्यवस्था की गई है |

 

और इसी  उद्देश्य से कार्यपालिका को लोकसभा के प्रति उत्तरदायित्व बनाया गया है और विधायिका तथा कार्यपालिका की मनमानी प्रमुख कृतियों के विरुद्ध न्यायपालिका को शक्ति दी गई है कि उसके संविधान विरुद्ध कार्य को है ,अविधि मान्य घोषित करके उन्हें अपनी अपनी सीमा में कार्य करने के लिए बाध्य किया जा सके

 

13 मई 1952 को स्वतंत्र भारत में संसद यानी राज्य सभा एवं लोक सभा की प्रथम बैठक हुई |भारतीय संसद एवं उनके कार्य करने की संबंध वर्णन संविधान के भाग 5 अध्याय 2 में अनुच्छेद 79 से 122|

 

संसद से सम्बंधित अनुच्छेद:-

  • अनु० ——-   विषय-वस्तु

  • 79—– संसद का गठन
  • 80—–राज्य सभा की सरंचना
  • 81—–लोक सभा की सरंचना
  • 82—–प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनः समायोजन
  • 83—–संसद के सदनों की अवधि
  • 84—–संसद की सदस्यता के लिए अर्हता
  • 85—–संसद के सत्र, सत्रावसान एवं विघटन
  • 86—–राष्ट्रपति का सदनों को संबोधित करने तथा संदेश देने का अधिकार
  • 87—–राष्ट्रपति का विशेष संबोधन (अभिभाषण)
  • 88—–सदनों के सम्बंध में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार।

              संसद के पदाधिकारी

  • 89—–राज्य सभा का सभापति तथा उपसभापति
  • 90—–राज्य सभा के उपसभापति पद की रिक्ति, त्यागपत्र तथा पद से हटाया जाना।
  • 91—–सभापति के कर्तव्यों के निर्वहन अथवा सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति अथवा अन्य व्यक्ति की शक्ति |
  • 92——जब राजसभा के सभापति अथवा उपसभापति को पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन हो तब उसका पीठासीन न होना
  • 93—–लोक सभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष
  • 94—–लोक सभा अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष पद की रिक्ति, त्यागपत्र तथा पद से हटाया जाना।
  • 95—–लोक सभा उपाध्यक्ष अथवा किसी अन्य व्यक्ति का लोक सभा अध्यक्ष के कर्तव्यों का निर्वहन
  • 96—–जब लोक सभा अध्यक्ष अथवा उपाध्यक्ष को पद से हटाने का संकलप विचाराधीन हो तब उसका पीठासीन न होना।
  • 97—–सभापति एवं उपसभापति तथा लोक सभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते
  • 98—–संसद का सचिवालय

         कार्यवाही का संचालन

  • 99—–सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
  • 100—–दोनों सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति तथा गणपूर्ति

         सदस्यों की अयोग्यता

  • 101—–स्थानों का रिक्त होना
  • 102—–संसद की सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
  • 103सदस्यों की अयोग्यता से सम्बंधित प्रश्नों पर निर्णय
  • 104—–अनुच्छेद 99 के अंतर्गत शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले अर्हित न होते हुए अथवा निरर्हित किए जाने पर भी सदन में बैठने तथा मतदान करने पर दंड।

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